जानिए आपका कौन सा चक्र बिगड़ा है और उसे कैसे ठीक करें

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क्या आप जानते हैं कि आपका शरीर केवल हड्डियों, मांसपेशियों और रक्त का ढाँचा नहीं है? इसके भीतर एक सूक्ष्म ऊर्जा तंत्र भी काम कर रहा है। यही तंत्र आपके सुख-दुख, सफलता-असफलता, स्वास्थ्य-रोग, और यहाँ तक कि आपके विचारों और भावनाओं को भी नियंत्रित करता है।

इस सूक्ष्म ऊर्जा तंत्र के केंद्र हैं – सात मुख्य चक्र। जब ये चक्र संतुलित होते हैं, तो जीवन में उर्जा, उत्साह, स्पष्टता और शांति होती है। लेकिन जब ये अवरुद्ध या असंतुलित हो जाते हैं, तो जीवन के हर क्षेत्र में समस्याएँ आने लगती हैं।


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सोचिए… अगर आप जान जाएँ कि आपका कौन सा चक्र बिगड़ा है, तो क्या आप उसे ठीक नहीं करना चाहेंगे?


आइए, विस्तार से समझते हैं सातों चक्रों को, उनके बिगड़ने के लक्षणों को, और उन्हें संतुलित करने के उपायों को।



(1) मूलाधार चक्र – आधार चक्र

मूलाधार चक्र शरीर का सबसे पहला और आधारभूत चक्र है। यह गुदा और लिंग (पुरुष) या योनि (स्त्री) के बीच स्थित होता है। इसकी चार पंखुड़ियाँ होती हैं। यही वह स्थान है जहाँ कुंडलिनी शक्ति सुप्त अवस्था में पड़ी रहती है।


यह चक्र पृथ्वी तत्व से संबंधित है। यह आपकी सुरक्षा, अस्तित्व, आधारभूत आवश्यकताओं (भोजन, वस्त्र, मकान), धन, नौकरी, और शारीरिक बल को नियंत्रित करता है।


जब यह चक्र बिगड़ता है, तो जीवन के ये पहलू प्रभावित होने लगते हैं। व्यक्ति में वीरता और आत्मबल की कमी आ जाती है। धन और समृद्धि में कमी आने लगती है। रोजगार में असफलता, घाटा, और कार्य में रुचि का अभाव हो जाता है।


शारीरिक रूप से यह चक्र बिगड़ने पर रक्त और हड्डी से संबंधित रोग होते हैं। कमर और पीठ में दर्द रहने लगता है। मानसिक रूप से डिप्रेशन, आत्महत्या के विचार, और जीवन के प्रति निराशा घर कर जाती है। गंभीर अवस्था में कैंसर जैसी बीमारियाँ भी हो सकती हैं।


मूलाधार चक्र को ठीक करने के उपाय

मूलाधार चक्र को ठीक करने के लिए सबसे पहले अपनी आधारभूत आवश्यकताओं पर ध्यान देना चाहिए। अपने रहने, खाने, और सुरक्षा की व्यवस्था को स्थिर करें।


इस चक्र को सक्रिय करने के लिए मूल बंध (मूलाधार को सिकोड़ना) का अभ्यास करें। योग में बद्ध कोणासन (बटरफ्लाई पोज़), मालासन (गरलैंड पोज़), और सर्वांगासन (शोल्डर स्टैंड) विशेष रूप से लाभकारी हैं।


प्राणायाम में नाड़ी शोधन और कपालभाति इस चक्र को शुद्ध करते हैं। ध्यान में लाल रंग का उपयोग करें। लाल रंग मूलाधार चक्र का रंग है। मंत्र का उपयोग करें तो लं (ॐ लं) बीज मंत्र का जाप करें।


अपने आहार में मूल (जड़ वाली सब्जियाँ) जैसे गाजर, चुकंदर, आलू, अदरक, और हल्दी को शामिल करें। प्रोटीन युक्त भोजन भी इस चक्र को पोषण देता है।



(2) स्वाधिष्ठान चक्र – रचनात्मकता और आनंद का केंद्र


मूलाधार चक्र के ठीक ऊपर, लिंग मूल (जननांग क्षेत्र) में स्वाधिष्ठान चक्र स्थित है। इसकी छह पंखुड़ियाँ होती हैं। यह जल तत्व से संबंधित है।


यह चक्र रचनात्मकता, आनंद, कामना, और प्रजनन को नियंत्रित करता है। यहीं से हमारी इच्छाएँ और भावनाएँ उत्पन्न होती हैं।


जब यह चक्र बिगड़ता है, तो व्यक्ति क्रूर, अहंकारी, और आलसी हो जाता है। उसमें प्रमाद (लापरवाही) और अवज्ञा (विद्रोह) की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। शारीरिक रूप से नपुंसकता, बाँझपन, मूत्राशय और गर्भाशय के रोग हो सकते हैं।


मानसिक रूप से बुद्धि मंद हो जाती है। आध्यात्मिक सिद्धियों के मार्ग में बाधाएँ आती हैं। जीवन के भौतिक सुखों (वैभव) के आनंद में भी कमी आ जाती है।


स्वाधिष्ठान चक्र को ठीक करने के उपाय


स्वाधिष्ठान चक्र को ठीक करने के लिए रचनात्मक कार्यों में अपना मन लगाएँ। चित्रकारी, संगीत, नृत्य, या कोई भी ऐसा काम जिसमें आपकी कल्पना और सृजनशीलता उपयोग हो।


योग में भुजंगासन (कोबरा पोज़), उष्ट्रासन (ऊँट पोज़), और बद्ध कोणासन (बटरफ्लाई पोज़) विशेष रूप से लाभकारी हैं। अश्विनी मुद्रा (गुदा का बार-बार सिकुड़ना और छोड़ना) और वज्रोली मुद्रा (मूत्रमार्ग का संकुचन) इस चक्र को सक्रिय करती हैं।


प्राणायाम में शीतली और शीतकारी (ठंडी श्वास) इस चक्र को शांत करती हैं। ध्यान में नारंगी रंग का उपयोग करें – नारंगी स्वाधिष्ठान का रंग है। वं (ॐ वं) बीज मंत्र का जाप करें।


अपने आहार में पानी की मात्रा बढ़ाएँ। तरबूज, ककड़ी, संतरा, और अन्य रसदार फल खाएँ। मेवे और बीज भी इस चक्र को पोषण देते हैं।



(3) मणिपूर चक्र – अग्नि और शक्ति का केंद्र


नाभि (पेट) के क्षेत्र में मणिपूर चक्र स्थित है। इसकी दस पंखुड़ियाँ होती हैं। यह अग्नि तत्व से संबंधित है।


यह चक्र व्यक्तित्व की शक्ति, इच्छाशक्ति, आत्म-विश्वास, और परिवर्तन की क्षमता को नियंत्रित करता है। यहीं से हमारा आंतरिक अग्नि (पाचन शक्ति) और तेज प्रज्वलित होता है।


मणिपूर चक्र के बिगड़ने का अर्थ है – जिंदगी का बिगड़ जाना। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं है। इस चक्र के असंतुलन से तृष्णा (अतृप्त इच्छा), ईर्ष्या, चुगली, लज्जा का अभाव, भय, घृणा, और मोह (आसक्ति) बढ़ जाते हैं।


व्यक्ति अधूरी सफलता से ग्रस्त हो जाता है। गुस्सा और चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है। नशाखोरी की प्रवृत्ति होने लगती है। अज्ञात भय (बिना कारण का डर) सताने लगता है। चेहरे का तेज गायब हो जाता है।


शारीरिक रूप से एसिडिटी, ब्लड प्रेशर, शुगर, थायराइड, सिरदर्द, शरीर में दर्द, किडनी और लीवर के रोग, कोलेस्ट्रॉल, और रक्त के रोग होते हैं। मानसिक रूप से डिप्रेशन, उग्रता, हिंसा, दुश्मनी, अपयश, अपमान, आलोचना, और बदले की भावना बनी रहती है।


मणिपूर चक्र को ठीक करने के उपाय


मणिपूर चक्र को ठीक करने के लिए आत्म-विश्वास और सकारात्मक सोच विकसित करें। अपनी इच्छाशक्ति को मजबूत करें।


योग में नौकासन (बोट पोज़), धनुरासन (बो पोज़), और पश्चिमोत्तानासन (सीटेड फॉरवर्ड बेंड) विशेष रूप से लाभकारी हैं। अग्निसार क्रिया और नौलि क्रिया (पेट की मालिश) इस चक्र को सक्रिय करती हैं। उड्डीयान बंध (पेट को अंदर खींचना) भी अत्यंत लाभकारी है।


प्राणायाम में भस्त्रिका (तेज श्वास) और सूर्य भेदन (दाएँ नथुने से श्वास) इस चक्र को प्रज्वलित करते हैं। ध्यान में पीले रंग का उपयोग करें – पीला मणिपूर का रंग है। रं (ॐ रं) बीज मंत्र का जाप करें।


अपने आहार में पीले रंग के फल और सब्जियाँ खाएँ – केला, अनानास, मक्का, हल्दी। दही, पनीर, और अनाज भी इस चक्र को पोषण देते हैं। गेहूँ, चावल, और दालें विशेष रूप से लाभकारी हैं।



(4) अनाहत चक्र – प्रेम और करुणा का केंद्र


हृदय (छाती) के क्षेत्र में अनाहत चक्र स्थित है। इसकी बारह पंखुड़ियाँ होती हैं। यह वायु तत्व से संबंधित है।


यह चक्र प्रेम, करुणा, सहानुभूति, क्षमा, और संबंधों को नियंत्रित करता है। यहीं से हमारी भावनाओं का गहरा जुड़ाव होता है।


जब यह चक्र बिगड़ता है, तो व्यक्ति में लिप्सा (अति लालसा), कपट (छल), तोड़-फोड़ की प्रवृत्ति, कुतर्क, चिंता, और नफरत बढ़ जाती है। प्रेम में असफलता और प्यार में धोखा मिलता है। व्यक्ति अकेलापन और अपमान महसूस करता है।


मोह और दम्भ बढ़ जाता है। अपनेपन में कमी आ जाती है। मन हमेशा उदास रहता है। सबकुछ होते हुए भी, जीवन में एक अजीब सी बेचैनी और बिरानगी (अपनापन न लगना) बनी रहती है।


शारीरिक रूप से छाती में दर्द, साँस लेने में दिक्कत, हृदय और फेफड़ों के रोग, और कोलेस्ट्रॉल में बढ़ोतरी होती है। जीवन में सुख का पूर्ण अभाव हो जाता है।


अनाहत चक्र को ठीक करने के उपाय


अनाहत चक्र को ठीक करने के लिए क्षमा करना सीखें – खुद को भी और दूसरों को भी। प्रेम और करुणा का भाव विकसित करें। किसी की सेवा करें, बिना किसी स्वार्थ के।


योग में उष्ट्रासन (ऊँट पोज़), मत्स्यासन (फिश पोज़), और भुजंगासन (कोबरा पोज़) विशेष रूप से लाभकारी हैं। हृदय की मालिश करें – छाती के मध्य भाग पर हल्का दबाव डालें।


प्राणायाम में भ्रामरी (भौंरों जैसी ध्वनि) और उज्जायी (गले से साँस लेना) इस चक्र को शांत करते हैं। ध्यान में हरे रंग का उपयोग करें – हरा अनाहत का रंग है। यं (ॐ यं) बीज मंत्र का जाप करें।


अपने आहार में हरी सब्जियाँ (पालक, मेथी, हरी मिर्च), हरे फल (अंगूर, कीवी, हरा सेब), और साग शामिल करें।



(5) विशुद्ध चक्र – संचार और अभिव्यक्ति का केंद्र


गले (कंठ) के क्षेत्र में विशुद्ध चक्र स्थित है। इसकी सोलह पंखुड़ियाँ होती हैं। यह आकाश तत्व से संबंधित है। यह देवी सरस्वती का स्थान है। यहाँ सोलह कलाएँ और सोलह विभूतियाँ विद्यमान हैं।


यह चक्र संचार, अभिव्यक्ति, सत्य बोलने की क्षमता, और सृजनात्मकता को नियंत्रित करता है। यहीं से हमारी वाणी और आत्म-अभिव्यक्ति संचालित होती है।


जब यह चक्र बिगड़ता है, तो वाणी में दोष आ जाता है। व्यक्ति अपनी बात सही ढंग से व्यक्त नहीं कर पाता। अभिव्यक्ति में कमी आ जाती है।


शारीरिक रूप से गले, नाक, कान, दांत, और थायराइड से संबंधित रोग होते हैं। आत्म-जागरण के मार्ग में बाधाएँ आती हैं।


विशुद्ध चक्र को ठीक करने के उपाय

विशुद्ध चक्र को ठीक करने के लिए सत्य बोलने का अभ्यास करें। झूठ, गपशप, और नकारात्मक बातों से बचें। अपनी भावनाओं को सही ढंग से व्यक्त करना सीखें।


योग में सर्वांगासन (शोल्डर स्टैंड), हलासन (प्लो पोज़), और मत्स्यासन (फिश पोज़) विशेष रूप से लाभकारी हैं। जालंधर बंध (गला लॉक) इस चक्र को सक्रिय करता है।


प्राणायाम में उज्जायी (गले से साँस लेना) और कीर्तन (भजन गाना) इस चक्र को शुद्ध करते हैं। ध्यान में नीले रंग का उपयोग करें – नीला विशुद्ध का रंग है। हं (ॐ हं) बीज मंत्र का जाप करें।


अपने आहार में तरल पदार्थ (जूस, सूप, नारियल पानी) और फल शामिल करें। शहद, अदरक, और हल्दी भी इस चक्र के लिए लाभकारी हैं।



(6) आज्ञा चक्र – अंतर्ज्ञान और निर्णय का केंद्र

दोनों भौंहों के बीच (भृकुटी मध्य) में आज्ञा चक्र स्थित है। यहाँ उंकार (ॐ), हूँ, फट्, विषद्, स्वधा, स्वाहा, सप्त स्वर आदि का निवास है।


यह चक्र अंतर्ज्ञान, निर्णय लेने की क्षमता, एकाग्रता, और आत्म-जागरूकता को नियंत्रित करता है। यहीं से हमारी तीसरी आँख (दिव्य दृष्टि) खुलती है।


जब यह चक्र बिगड़ता है, तो एकाग्रता में कमी आ जाती है। व्यक्ति में जीने की चाह (जीवटता) कम हो जाती है। निर्णय लेने की शक्ति (निर्णय शक्ति) और मानसिक शक्ति (मानसिक बल) घट जाती है।


सफलता के मार्ग में रुकावटें आने लगती हैं। इस चक्र के बिगड़ने का अर्थ है – सब कुछ बिगड़ जाने का खतरा। क्योंकि यह सभी चक्रों का नियंत्रण केंद्र है।


आज्ञा चक्र को ठीक करने के उपाय


आज्ञा चक्र को ठीक करने के लिए ध्यान और एकाग्रता का अभ्यास करें। अपने अंतर्ज्ञान (इंट्यूशन) पर भरोसा करें और उसका उपयोग करना सीखें।


योग में शशांकासन (हरे पोज़), बालासन (चाइल्ड पोज़), और शीर्षासन (हेडस्टैंड) विशेष रूप से लाभकारी हैं। शांभवी मुद्रा (भौंहों के बीच नज़र लगाना) और त्राटक (एक बिंदु पर नज़र लगाना) इस चक्र को सक्रिय करते हैं।


प्राणायाम में अनुलोम-विलोम (नाड़ी शोधन) और भ्रामरी (भौंरों जैसी ध्वनि) इस चक्र को शुद्ध करते हैं। ध्यान में नीले या बैंगनी रंग का उपयोग करें। ॐ (ॐ) बीज मंत्र का जाप करें।


अपने आहार में नीले और बैंगनी फल (ब्लूबेरी, बैंगन, अंजीर, अंगूर) शामिल करें। डार्क चॉकलेट भी इस चक्र के लिए लाभकारी है। प्राकृतिक, असंसाधित भोजन खाएँ।



(7) सहस्रार चक्र – आत्म-साक्षात्कार का केंद्र


सहस्रार चक्र मस्तिष्क के मध्य भाग में स्थित है। यह सातवाँ और सर्वोच्च चक्र है। शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथियों से संबंध रखने वाला रैटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम (RAS) का अस्तित्व है। यहीं से जैविक विद्युत का स्वयंभू प्रवाह उभरता है।


यह चक्र आत्म-साक्षात्कार, ब्रह्मांडीय चेतना, और पूर्ण ज्ञान को नियंत्रित करता है। यहीं साधक की यात्रा पूर्ण होती है।


जब यह चक्र बिगड़ता है (अर्थात अवरुद्ध या असंतुलित होता है), तो मानसिक बीमारियाँ (अवसाद, चिंता, अनिद्रा, भ्रम) उत्पन्न होती हैं। आध्यात्मिकता का अभाव हो जाता है – व्यक्ति को अपने अस्तित्व के गहरे अर्थ का आभास नहीं होता। भाग्य का साथ नहीं देता – सफलता के बावजूद संतोष नहीं मिलता।


सहस्रार चक्र को ठीक करने के उपाय


सहस्रार चक्र को ठीक करने के लिए नियमित ध्यान और प्रार्थना करें। कृतज्ञता (ग्रैटिट्यूड) का अभ्यास करें – जो कुछ भी है, उसके लिए आभारी रहें।


योग में शीर्षासन (हेडस्टैंड) और सर्वांगासन (शोल्डर स्टैंड) इस चक्र को सक्रिय करते हैं। सभी चक्रों को संतुलित करने के लिए पूर्ण योग साधना आवश्यक है।


ध्यान में सफेद, बैंगनी, या सुनहरे रंग का उपयोग करें। सबसे महत्वपूर्ण – किसी भी चक्र को अलग से मजबूत न करें, बल्कि सभी सात चक्रों को संतुलित करने का प्रयास करें। इसके लिए संपूर्ण चक्र ध्यान (सभी चक्रों का एक साथ ध्यान) विशेष रूप से लाभकारी है।



अपना चक्र कैसे पहचानें?


यह जानने का सबसे अच्छा तरीका है कि अपने जीवन और स्वास्थ्य का निरीक्षण करें। ऊपर दिए गए लक्षणों को ध्यान से पढ़ें।


यदि आप अत्यधिक असुरक्षित, भयभीत, धन-नौकरी की समस्या से ग्रस्त, या पीठ के दर्द से पीड़ित हैं – तो संभवतः आपका मूलाधार चक्र बिगड़ा है।


यदि आप रचनात्मकता में अवरोध, यौन समस्याएँ, या आनंद में कमी महसूस कर रहे हैं – तो स्वाधिष्ठान चक्र पर ध्यान दें।


यदि आप अत्यधिक गुस्सा, चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन, या पाचन संबंधी रोगों से ग्रस्त हैं – तो मणिपूर चक्र का संतुलन बिगड़ा है।


यदि आप अकेलापन, प्रेम में असफलता, दिल के रोग, या साँस लेने में दिक्कत महसूस कर रहे हैं – तो अनाहत चक्र अवरुद्ध है।


यदि आप सही ढंग से बात नहीं कर पा रहे हैं, गले, थायराइड, या वाणी से संबंधित समस्याएँ हैं – तो विशुद्ध चक्र पर काम करें।


यदि आप एकाग्रता में कमी, निर्णय लेने में असमर्थता, या मानसिक थकान महसूस कर रहे हैं – तो आज्ञा चक्र को संतुलित करें।


यदि आपको जीवन में कोई गहरा अर्थ नहीं दिखता, आध्यात्मिकता से दूर हो गए हैं – तो सहस्रार चक्र पर ध्यान दें।



अंतिम निष्कर्ष


सातों चक्र आपके शरीर, मन और आत्मा के अभिन्न अंग हैं। ये कोई काल्पनिक अवधारणा नहीं हैं। ये आपके सूक्ष्म शरीर के वास्तविक ऊर्जा केंद्र हैं।


जब ये चक्र संतुलित होते हैं, तो जीवन में सब कुछ सही चलता है – स्वास्थ्य, धन, संबंध, सफलता, और आंतरिक शांति। जब ये अवरुद्ध या असंतुलित होते हैं, तो समस्याएँ आने लगती हैं।


अच्छी खबर यह है कि इन चक्रों को ठीक किया जा सकता है। योग, प्राणायाम, ध्यान, उपयुक्त आहार, और सकारात्मक मानसिकता से आप अपने चक्रों को पुनः संतुलित कर सकते हैं।


सोचिए… यदि आज आप अपने बिगड़े चक्र को पहचानकर उसे ठीक करना शुरू कर दें, तो कुछ ही दिनों, हफ्तों, या महीनों में आपका जीवन कितना बदल सकता है?


शुरुआत आज से करें। अपने शरीर को सुनें। अपने चक्रों को महसूस करें। और उन्हें संतुलित करने की दिशा में एक कदम बढ़ाएँ।


क्या आपने कभी अपने किसी चक्र को महसूस किया है? अपने अनुभव कमेंट में साझा करें।


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प्रमुख स्रोत: 

कुंडलिनी तंत्र (स्वामी सत्यानंद सरस्वती)

चक्र और कुंडलिनी विज्ञान

योग दर्शन, हठ योग प्रदीपिका

आधुनिक चक्र रिसर्च


लेखक: KaalTatva.in टीम

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